Thursday, April 23, 2026
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उत्तराखंड के उच्च हिमालय में मिला दुर्लभ चागा मशरूम, औषधीय गुणों को लेकर बढ़ी वैज्ञानिकों की रुचि

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रकृति का एक अनमोल औषधीय खजाना सामने आया है। जड़ी-बूटी शोध संस्थान, मंडल से सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विजय भट्ट ने पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र के बालिंग और सीपू जैसे दुर्गम इलाकों में दुर्लभ चागा मशरूम की पहचान की है। यह खोज औषधीय अनुसंधान की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

वैज्ञानिकों के अनुसार चागा मशरूम (इनोनोटस ओब्लिक्वस) केवल उन्हीं भोजपत्र के पेड़ों के तनों पर उगता है, जिनकी आयु 100 वर्ष से अधिक होती है। अब तक यह माना जाता रहा है कि यह मशरूम मुख्य रूप से साइबेरिया और रूस के ठंडे जंगलों तक ही सीमित है, लेकिन धारचूला और नीति घाटी में 3000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर इसकी मौजूदगी ने शोधकर्ताओं को उत्साहित कर दिया है। देखने में यह जले हुए कोयले या मधुमक्खी के छत्ते जैसा भूरा-काला दिखाई देता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमत

चागा मशरूम की अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग बताई जाती है। दिल्ली समेत देश के बड़े महानगरों में रूस और साइबेरिया से आयातित चागा मशरूम 25 से 30 हजार रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसके संरक्षण और वैज्ञानिक तरीके से दोहन की दिशा में काम किया जाए, तो सीमांत क्षेत्रों के ग्रामीणों के लिए यह आजीविका का एक नया साधन बन सकता है।

औषधीय चाय के रूप में उपयोग

डॉ. विजय भट्ट के अनुसार चागा मशरूम को वैज्ञानिक विधि से सुखाकर उसका पाउडर तैयार किया जाता है, जिसका उपयोग शहद के साथ हर्बल चाय के रूप में किया जाता है। इसमें विटामिन-डी2, पॉलीसैकेराइड्स और कई आवश्यक खनिज तत्व पाए जाते हैं। डॉ. भट्ट ने यह चाय बेंगलुरु, दिल्ली और चंडीगढ़ के कुछ मरीजों तक भेजी है, जहां से उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिली हैं। हालांकि वे इसे पारंपरिक चिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक आहार के रूप में देखते हैं।

क्यों खास है चागा मशरूम

  • दुर्लभ विकास: यह केवल 100 वर्ष से अधिक पुराने भोजपत्र के पेड़ों पर परजीवी के रूप में उगता है।

  • इम्यून सपोर्ट: शोधों में इसे रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहारा देने वाला माना गया है।

  • एंटी-ऑक्सीडेंट गुण: इसमें पाए जाने वाले तत्व कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में सहायक बताए जाते हैं।

  • मेटाबॉलिक संतुलन: कुछ अध्ययनों में इसके शुगर नियंत्रण और डिटॉक्स प्रभावों पर भी काम हुआ है।

विशेषज्ञों की चेतावनी

डॉ. विजय भट्ट ने स्पष्ट किया है कि जंगली मशरूमों की पहचान बेहद कठिन होती है। बिना विशेषज्ञ सलाह के किसी भी प्रकार के मशरूम का सेवन जानलेवा हो सकता है। इसलिए चागा मशरूम के उपयोग से पहले वैज्ञानिक पुष्टि और चिकित्सकीय परामर्श अनिवार्य है।

यह खोज न केवल उत्तराखंड की जैव विविधता को नई पहचान देती है, बल्कि भविष्य में औषधीय अनुसंधान और स्थानीय रोजगार की संभावनाओं के द्वार भी खोलती है।

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1 COMMENT

  1. The discovery of Chaga mushroom in Uttarakhand’s Himalayas exemplifies how nature holds solutions waiting to be found. As someone who observes innovation across sectors, I’m reminded that breakthrough opportunities often emerge from unexpected places. Just as jljl11 download brings entertainment to new markets, this medicinal treasure could transform rural livelihoods through sustainable harvesting.

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